*लोकतंत्र में विरोध लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहकर होना चाहिए राकेश राणा*
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन करना हर राजनीतिक दल और नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। विरोध सांकेतिक हो, विचारों पर आधारित हो और राजनीतिक मर्यादाओं के अनुरूप हो, तो लोकतंत्र मजबूत होता है। लेकिन आज मसूरी में भूमि घोटाले के विरोध में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री गणेश गोदियाल जी के नेतृत्व में हो रहे प्रदर्शन के दौरान जिस तरह चुनिंदा भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा काले झंडे दिखाकर, चिल्लाकर और लाठी-डंडों के सहारे टकराव पैदा करने का प्रयास किया गया, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है।
हमें याद रखना चाहिए कि राजनीति में सत्ता और विपक्ष दोनों की अपनी-अपनी भूमिका होती है। हमने भी विपक्ष में रहते हुए अनेक जनहित के मुद्दों पर आंदोलन और प्रदर्शन किए हैं, लेकिन हमेशा लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन किया। कभी व्यक्तिगत दुर्भावना को राजनीतिक विरोध का आधार नहीं बनाया और न ही विरोध को हिंसक टकराव में बदलने का प्रयास किया।
आज भाजपा जिस नकारात्मक राजनीतिक परंपरा को जन्म देने का प्रयास कर रही है, वह उत्तराखंड की स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं है। इतिहास के पन्नों में भाजपा की वैचारिक पूर्ववर्ती ताकतों की अंग्रेजी हुकूमत के प्रति भूमिका और स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। इसलिए लोकतंत्र और राजनीतिक शिष्टाचार का पाठ पढ़ाने से पहले भाजपा को अपने राजनीतिक आचरण पर आत्ममंथन करना चाहिए।
हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि राजनीतिक विरोध का जवाब राजनीतिक और लोकतांत्रिक तरीके से ही दिया जाएगा। लेकिन यदि किसी को लगता है कि डराने, धमकाने और हिंसक टकराव के माध्यम से विपक्ष की आवाज दबाई जा सकती है, तो यह उसकी भूल है।
भाजपा ने यदि ऐसी नकारात्मक परंपरा की शुरुआत की है, तो उसे इसके लोकतांत्रिक और राजनीतिक परिणामों का सामना करने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। हम हर लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार के साथ खड़े हैं, लेकिन हिंसा और अराजकता को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।
लोकतंत्र में लाठी नहीं, तर्क की ताकत चलनी चाहिए और सत्ता के अहंकार से नहीं, जनता की आवाज से राजनीति चलनी चाहिए।
— राकेश राणा महासचिव, प्रदेश कांग्रेस कमेटी उत्तराखंड प्रभारी देवप्रयाग–नरेंद्रनगर
