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अयोध्या Ram Mandir: ‘रामलला रहेंगे विराजमान’, High Court के फैसले ने बनाई संघर्ष की कहानी

अयोध्या Ram Mandir: 'रामलला रहेंगे विराजमान', High Court के फैसले ने बनाई संघर्ष की कहानी

Ayodhya Ram Mandir: राम लल्ला की मूर्ति 6 दिसम्बर 1992 को संरचना के ढांचे के पतन से पहले वहां से हटाई गई थी। संरचना के विध्वंस के बाद, कार सेवक्स ने दो दिनों तक परिसर का कब्जा किया। कार सेवक्स ने एक प्लेटफ़ॉर्म और एक अस्थायी मंदिर बनाया और वहां रामलला की मूर्ति को स्थापित किया और पूजा की।

देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक स्तर पर तकरारें हुईं। कई अधिकारी आरोपित हुए। Kalyan Singh सरकार के अस्तीत्व से बगावत होने पर, राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। केंद्र सरकार ने 1991 में Kalyan Singh सरकार द्वारा श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट को दिए गए भूमि सहित कुल संरचना के 67 एकड़ को हासिल किया। इसे हजारों लोहे के पाइप्स से घेरा गया था।

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राष्ट्रपति शासन के बावजूद, केंद्रीय सुरक्षा बल दो दिनों के बाद संरचना के परिसर तक पहुँचे, 3:35 बजे, संरचना के पतन के दिनों के बाद। कार सेवक्स को मनाने के बाद, उन्होंने परिसर का कब्जा किया। शहर में कर्फ्यू था। 8 दिसम्बर को, वकील हरिशंकर जैन की पेटीशन पर, न्यायाधीशों ने राम लल्ला की पूजा शुरू करने के लिए निर्देश दिया।

पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की, जिनमें लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, अशोक सिंघल, उमा भारती और विनय कटियार शामिल थे। उन्हें गिरफ्तार किया गया। केंद्र ने संरचना के विध्वंस की जाँच को CBI को सौंपी।

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2020 में, 30 सितंबर को, सभी 32 आरोपी बरी कर दिए गए। राव सरकार ने इस विध्वंस मामले की जाँच के लिए न्यायाधीश Manmohan Singh लिबरहान की अध्यक्षता में एक जाँच आयोग स्थापित किया, जिसने 17 वर्षों में एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें लगभग 8 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद तीन महीने के बजाय यह रिपोर्ट अनिर्णायक रह गई। इसके बावजूद, राजनीति मंदिर बनाम मस्जिद के मुद्दे पर जारी रही। प्रधानमंत्री राव ने मस्जिद की पुनरनिर्माण की घोषणा की। कई बार की चर्चाएं हुईं, लेकिन कोई परिणाम नहीं हुआ।

संरचना के पतन के बाद, विश्व हिन्दू परिषद और श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट ने मंदिर निर्माण के लिए पत्थर कटने की शुरुआत की। ब्रेवरी डे बनाम ब्लैक डे नामक घटनाओं ने दोनों पक्षों में माहौल को गरम किया। बाद में, दोनों पक्षों ने मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की मांग की। कई सूत्र बनाए गए और बदले गए, लेकिन मामला कारगर नहीं हुआ।

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केंद्र में Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व में क्रमशः 13 दिन और 13 महीने के बाद जब 1999 में सरकार बनी, तो संतों ने BJP के मंदिर निर्माण में सहयोग की बात याद दिलाई। पर सरकार चुप रही। इससे नाराज महंत रामचंद्र दास परमहंस और अशोक सिंहल ने फरवरी से कार्यक्रम तथा मार्च में कारसेवा की घोषणा की।

Supreme Court के रुख पर Vajpayee सरकार को अयोध्या में प्रतिबंध लगाने पड़े। तनाव बढ़ा। परमहंस के आत्मदाह करने की चेतावनी पर Vajpayee ने वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को अयोध्या भेजकर प्रतीकात्मक शिलादान कराकर टकराव टाला। उसी दौरान अयोध्या से गुजरात वापस जाते वक्त साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगने से 50 से ज्यादा लोगों की जान गई, जिसे गोधरा कांड कहा गया।

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मील का पत्थर बना High Court का फैसला

30 सितंबर, 2010। प्रदेश में मायावती सरकार। शाम को पता चला कि न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसयू खान, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल और न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा की पीठ ने रामलला को विराजमान रखने का आदेश दिया है। दो न्यायाधीशों ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि को मस्जिद पक्ष, निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच बराबर बांटने को कहा है तो एक न्यायमूर्ति शर्मा ने पूरी भूमि मंदिर की मानी है।

मुझे तकनीकी पक्ष से क्या लेना देना था। मेरे लिए तो यही बहुत था कि मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया था। कारण, फैसले में जमीन के दो हिस्से मंदिर के ही थे। फैसले की पृष्ठभूमि…High Court के सेवानिवृत्त न्यायाधीश देवकीनंदन अग्रवाल ने 1989 में रामलला विराजमान और राम जन्मस्थान को वादी बनाते हुए उनके सखा के रूप में पांचवां मुकदमा दायर कर फैजाबाद की अदालत में पड़े मुकदमों को इससे जोड़कर सुनवाई की मांग की।

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तब High Court ने फैजाबाद जिला अदालत के सभी चार मुकदमों को अपने यहां ट्रांसफर कर एकसाथ सुनवाई शुरू की। इसी में High Court के निर्देश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ASI ने संबंधित स्थल की खोदाई की। जिसकी रिपोर्ट भी फैसले का आधार बनी। हालांकि मामला ऊपर की अदालत में चला गया।

1999 में Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व में केंद्र सरकार बनी थी, तब संतों ने BJP को मंदिर निर्माण में उसके सहयोग की याद दिलाई। लेकिन सरकार चुप रही। इस पर क्रोधित होकर महंत रामचंद्र दास परमहंस और अशोक सिंघल ने फरवरी में कार्यक्रम की घोषणा की और मार्च में कर सेवा की बुलाई।

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Vajpayee सरकार को Supreme Court के स्थान का कारण अयोध्या में प्रतिबंध लगाना पड़ा। तनाव बढ़ा। परमहंस की खुदकी कोख में आत्महत्या की चेतावनी पर Vajpayee ने सीनियर अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को अयोध्या भेजकर परराष्ट्रीय पत्थर दान किया। इसी दौरान, जब साबरमती एक्सप्रेस को गुजरात से लौटते समय आग लगी, तो उसे गोधरा हादसा कहा गया, जिसमें 50 से अधिक लोगों की जान चली।

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