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पांडव लीला हमारी सांस्कृतिक विरासत और धरोहर:आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी आस्था के साथ इस नृत्य का किया जाता है आयोजन ।

*पांडव लीला हमारी सांस्कृतिक विरासत और धरोहर है राकेश राणा*

*प्रताप नगर प्रखंड की पट्टी रोनद रमोली मध्य भरपूर और भेंतला खाल में आयोजित हो रही है पांडव लीला*

प्रताप नगर क्षेत्र की जनता इन दिनों पांडव लीला में लीन है. ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी आस्था के साथ इस नृत्य का आयोजन किया जाता है. पांडव लीला के आयोजन से बाहरी शहरों में रह रहे प्रवासी गांव की ओर रुख कर रहे हैं।

ऐसे में गांव का माहौल भक्तिमय बना हुआ है पांडव लीला को भी ग्रामीणों में बहुत आवश्यक माना जाता है , अगर ग्रामीण इस नृत्य का आयोजन नहीं करते हैं तो मवेशियों में खुरपका जैसी बीमारियां होने लगती है.
पांडव लीला मनाने का विशेष महत्व है माना जाता है कि पांडवों ने स्वर्गारोहणी जाने से पूर्व यहां के लोगों को अपने अस्त्र-शस्त्र दिये थे।

जिससे वे चिरकाल तक इनकी पूजा-अर्चना करते रहें. आज भी लोग पांडवों की परंपराओं को निभाते आ रहे हैं।

पांडव लीला में रात के समय कथा ओर नृत्य लीलाओं का आयोजन होता है. इन लीलाओं को देखने के लिए बाहरी प्रवासी भी गांव की ओर रुख किए हुए हैं.

जिला कांग्रेस कमेटी टिहरी गढ़वाल के अध्यक्ष राकेश राणा ने प्रताप नगर प्रखंड के भरपूर और भेंतला खाल में आयोजित पांडव लीला के आयोजन मैं बतौर मुख्य अतिथि यह बात कही ।

उन्होंने कहा कि क्षेत्र में इस तरह के आयोजन से खुशहाली बनी रहती है, जिन जगहों पर इन लीलाओं का आयोजन नहीं होता है, वहां मवेशियों में खुरपका जैसी बीमारी होनी शुरू हो जाती हैं. ग्रामीणों को इस बीमारी से निजात पाने के लिए लीला का आयोजन करना ही पड़ता है।

लीलाओं में चक्रव्यूह का आयोजन के दौरान दूर-दराज क्षेत्रों से हजारों की संख्या में कार्यक्रम स्थल में लोग पहुंचते हैं. लीलाओं के आयोजन में शासन और प्रशासन की ओर से कोई सहायता नहीं की जाती है. स्वयं के खर्चे पर ग्रामीण ये आयोजन करते है।

देवभूमि को पांडवों की धरती भी कहा जाता है. मान्यता है कि पांडव यहीं से स्वार्गारोहणी के लिए गए थे।

स्वर्गारोहणी तक पांडव जहां-जहां से गुजरे थे उन स्थानों पर विशेष रूप से पांडव लीला आयोजित होती है।

प्रत्येक वर्ष सितंबर से फरवरी माह तक विभिन्न गांव में पांडव नृत्य का आयोजन होता है. नृत्य के दौरान पांडवों के जन्म से लेकर मोक्ष तक का चित्रण किया जाता है ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी आस्था के साथ इस नृत्य का आयोजन किया जाता है।

पांडव लीला के आयोजन से बाहरी शहरों में रह रहे प्रवासी गांव की ओर रूख किये हुए हैं और धियाणियां भी अपने मायके में पहुंच रही है।

ऐसे में गांव का माहौल भक्तिमय बना हुआ है। यह लीला करीबन नो से ग्यारह दिन तक चलती है, जिसमें कईं दृश्य पेश किये जाते हैं।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण चक्रव्यूह, हाथी कौथिग और गैंडा वध को देखने के लिए श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ता है। जगह-जगह हो रही लीलाओं के आयोजन से पूर्व जहां कल तक गांवों में वीरानी देखी जाती थी, वहीं आज जमावड़ा लगा हुआ है।
उपरोक्त कार्यक्रम में समिति के अध्यक्ष सुभाष रावत सभापति अबल सिंह रावत एडवोकेट किशन सिंह रावत प्रधान चंद्रवीर सिंह रावत, विनोद रावत संचालक उमेद सिंह रावत पूर्व प्रधान शूरवीर सिंह भंडारी दिनेश रावत सुरेंद्र सिंह रावत नरेश पवार मुरारी सिंह पवार राजेंद्र सिंह किशोर पंवार ,सुनील पंवार ,सुमेर पंवार आदि लोग सामिल थे।
भरपूर में केदार सिंह कलूड़ा बुद्धि सिंह कलूड़ा ,भूपेंद्र सिंह ,सतपाल सिंह ,गुड्डू सिंह ,प्रधान ममता ओमप्रकाश ,आरती संजय कलूड़ा ग्रीश छोड़ियाट्ठा, भगत सिंह ,लक्क्मन सिंह ,धनवीर सिंह आदि लोग शामिल थे।

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